Hindi Story - हिंदी कहानी : आज हम आपके लिए पेश करते हैं आर.के. श्रीवास्तव (छत्तीसगढ़) के द्वारा लिखी कहानी '6 आने का कर्ज', एक मजेदार हिंदी कहानी है इस कहानी में किस प्रकार एक बेटा अपने स्वर्गवासी पिता के 'छह आने' के कर्ज को चुकाता है इस कहानी में इसी बारे में बताया गया है कहानी मनोरंजक और सस्पेंस से भरपूर है इसलिए अंत तक जरूर पढियेगा। 
तो आईये आपको कहानी की तरफ ले चलते हैं।



Story Title:              6 Aane Ka Karz
Author:  R.K. Shrivastav
Language:  Hindi

Hindi Story 6 Aane Ka Karz

छ: आने का कर्ज 

निर्मल बहुत हैरान और परेशान था क्योंकि उसे कुछ दिनों से एक ही बार-बार सपना दिखाई दे रहा था । और वह इस सपने का सिर-पैर समझने में पूरी तरह से असमर्थ था । सपने में उसे अपने स्वर्गीय (मर चुके) पिता दिखाई देते थे, जिनकी दो माह पहले ही मृत्यु हुई थी । वे बहुत परेशान मालूम होते और हमेशा कुछ ढूँढते हुए ही दिखाई पड़ते थे । 

चैनपुर-माकड़ी निवासी अमरलाल के दो बेटों में निर्मल बड़ा और श्यामल छोटा था । श्यामल अपने ससुराल फुलवारी कला में घरजमाई होकर रह रहा था । उसकी पत्नी शोभना अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी अतः ससुराल की खेती बाड़ी तथा किराने की दुकान श्यामल ही संभालता था । 

निर्मल के पास थोड़ी सी पुश्तैनी (बाप-दादाओं की देन) जमीन थी, और कुछ भूमि उनके पिताजी ने रिटायर होने के बाद खरीदी थी । 
इसके अलावा अतिरिक्त आमदनी के उद्देश्य (मकसद) से उसने घर पर ही हालर मिल तथा आटाचक्की लगवा रखा था । इससे भी उसे अच्छी आमदनी (कमाई,इनकम) होती थी । 

निर्मल के पिता उसके साथ ही रहते थे । उसकी माँ का देहांत

 बरसों पहले ही हो चुका था । अमरलाल दो महीने तक बीमार रहने के बाद जब स्वर्गवासी हुए तब वे सतहत्तर (77) वर्ष के थे । निर्मल तथा श्यामल ने उनका क्रियाकर्म पारिवारिक तथा शास्त्रीय विधि अनुसार उनका किया ।

किसी आत्मीय (करीबी) जन की मृत्यु होने पर माया में फंसे जीवों को मात्र चार-छ: घड़ी तक ही वैराग्य (मोह माया से मुक्ति) का अनुभव होता है, जिसे श्मशान वैराग्य कहा जाता है । इसके बाद वह पुनः माया-मोह में लीन (लगना) हो जाता है, यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति है ।

अमरलाल का स्वर्गवास हुए अभी दो महीना ही हुआ था कि निर्मल ने स्वप्न (सपना) में अपने पिता को देखा जो काफी परेशान दिख रहे थे !

-उसके पूछने से पहले ही अमरलाल बोल पड़े--बेटा निर्मल ! मेरे अपने पैसे कहीं खो गये । कुल ‘छै आना’ है ! शायद कहीं रखकर भूल गया हूँ ! 

निर्मल जब तक पिता के पैसों को ढूँढता या उनसे कुछ पूछता इससे पहले ही उसकी नींद खुल गयी ।

वह बहुत देर तक इस सपने के बारे में ही सोचता रहा । उसने यह भी सोचा कि कहीं पिता की क्रिया में उससे जाने-अनजाने कोई कमी या भूल तो नहीं हो गयी ? जिसकी वजह से उनके पिता जी की आत्मा भटक रही है । 

उसने इस स्वप्न के बारे में अपनी पत्नी कालिन्दी को बताया । कालिन्दी ने कहा – हाँ हमसे एक भूल तो हुई है । हमें पिछले अमावस्या को पिताजी के नाम से पुरोहित जी के यहाँ सीधा (दक्षिणा) भेजना चाहिए था । जो हम भूल गये ! शायद यही याद दिलाने के लिए पिताजी स्वप्न में दिखाई दिये होंगे । दो दिन बाद ही अमावस्या है । इस बार पिताजी के नाम से हम लोग पुरोहित जी के यहाँ 'सीधा' अवश्य देंगे । 

निर्मल को कालिन्दी की बात जँच गयी । उन्हें बड़ों की बातों पर पूरा भरोसा था कि आदमी को अपनी भूलचूक या किसी बात की कमीबेशी (कम-ज्यादा) का पता स्वप्न के माध्यम से भी होता है ।

अमावस्या को निर्मल स्वयंअपने कुल पुरोहित विद्याधर शर्मा जी के घर 'सीधा' लेकर गया और यह निवेदन भी किया कि आज आप सपरिवार इसी सीधे (दान की सामग्रियों) से प्रसाद पावें । 

कुछ दिनों निर्मल ने फिर वही सपना देखा कि अमरलाल अपने खोये पैसों को लेकर परेशान हैं,और को इधर-उधर ढूँढ रहे हैं ।

अगली बार अमावस्या को सीधे के साथ कुछ नगदी रकम भी पुरोहित को दिया गया । साथ ही भिक्षुओं को भोजन कराया और उन्हें दक्षिणास्वरुप कुछ द्रव्य (पैसे अथवा मुद्रा) भी भेंट किया । इसके बावजूद उसे यह स्वप्न दिखाई देना बंद नहीं हुआ ।

स्वर्गवासी अमरलाल कभी भी कालिन्दी या उनके बच्चों के सपनों में नहीं दिखाई दिये । यही नहीं श्यामल या उसकी पत्नी शोभना ने भी सपने में उन्हें नहीं देखा था । वे सिर्फ निर्मल को ही सपने में छ: आने ढूंढते हुए दिखाई पड़ते । 


अमरलाल को स्वर्गवासी हुए एक वर्ष होने को आया । उनके दोनों पुत्रों ने पिता की वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर अपने सभी रिश्तेदारों, परिचितों तथा अपने पिता के मित्रों के परिवार को निमंत्रित किया । जो संबंधी किसी कारणवश उन के अंतिम संस्कार के समय उपस्थित नहीं हो पाये थे,वे भी इस अवसर पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने चैनपुर-माकड़ी पधारे थे ।

संध्या के समय ठाकुर अरिदमन सिंह पथारे (आये)। जो झारसुगुड़ा में रहते थे तथा पचहत्तर (75) साल की उम्र में सैकड़ों मील का सफर करके अकेले आये थे ।

अमरलाल की मृत्यु के समय वे बहुत बीमार थे अतः अपने मित्र की क्रिया में सम्मिलित नहीं हो सके थे । 
निर्मल को ठाकुर काका के आगमन (मौजूदगी) से आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई ।

ठाकुर काका ने उसी कमरे में ठहरने की इच्छा जताई जिसमें निर्मल के पिता रहते थे, और जहाँ उन्होंने अंतिम साँस लिया था ।

निर्मल ने ठाकुर काका को लकड़ी के तख्त पर बैठाया और आप भूमि पर बैठ गया । निर्मल को बहुत ताज्जुब हो रहा था कि इतनी वृद्धावस्था में इतना लंबा सफर करने के बावजूद काका में थकावट का कोई निशान नहीं था । उनके बदन की चुस्ती और फुर्ती देखते ही बन रही थी । 

ठाकुर काका ने थोड़ी देर तक उसे स्नेह पूर्वक निहारा और पूछा – बेटा ! कुछ परेशान लग रहे हो ! कोई बात है ? 

नहीं काका ! सब ठीक है, कोई परेशानी नहीं है ! 
नहीं ! मुझे मालूम है कि तुम परेशान हो ! 

सपना – निर्मल बोल उठा – मैं एक सपने से बहुत परेशान हूँ काका जी – वही एक सपना बार-बार क्यों दिखाई देता है ?

बेटा ! संसार में कोई भी चीज बिना कारण के नहीं होती – हर बात के होने के पीछे कोई ना कोई कारण होता है ! तुम सपने में अमर लाल को देखते हो ! है ना ? 
आपको कैसे मालूम काका जी -वह आश्चर्य से भर उठा ?

वह मेरे सपनों में भी आता है --

आपके सपनों में भी ?

हाँ ! अमर मेरा सबसे प्रिय मित्र था, इसलिए उसका मेरे सपनों में आना कोई बड़ी बात नहीं है । -काका ने कहा । 
पिताजी ! आपके सपने में क्या करते हैं ? – निर्मल ने पूछना चाहा !

ठाकुर काका ने जैसे उनकी मन की बात पढ़ ली हो , बोले- वही ! जो तुम्हारे सपनों में करता है !

छ: आने की तलाश ? (छ:आना = 36 पैसे )

हाँ !

काका ! यह छ: आना का किस्सा क्या है ?

वही बताने तो आया हूँ इतनी दूर से – काका ने मुस्कराते हुए कहा – मेरे तथा अमरलाल के सिर पर गंगाधर महराज का छ:आने का कर्ज सवार है । उससे उऋण हुए बिना प्रेतयोनि (भूत के रूप) से मुक्ति संभव नहीं है ! 
मेरे पिताजी प्रेतयोनि में हैं ?

हाँ ! 

क्यों ?

हम दोनों ने गंगाधर चाचा को छ:आना नहीं लौटाया था, जो उनकी दक्षिणा के पैसे थे और हमसे हजम ना हुए !

गंगाधर महाराज यानी विद्याधर के दादाजी –

हाँ ! वही गंगाधर यानी पंडित चाचा । गाँव के रिश्ते में वे मेरे मामा थे किंतु अमर की दोस्ती की वजह से मै भी उन्हें चाचा कहता था ।

यह कब की बात है ? 

ठाकुर साहब ने थोड़ी देर तक निर्मल को भावशून्य नजरों से घूरते रहे फिर बोले –बेटा ! यह कोई अच्छी या बहादुरी की बात नहीं है । तब भी सुनो ! छ:आने वाला यह किस्सा सन् उन्नीस सौ पैंसठ (1965) का है ।

मेरी माँ रत्नप्रभा ठाकुर बलभद्र सिंह की इकलौती (केवल एक) संतान थी, । इस कारण वह अधिकतर यहीं मायके में रहती थी मेरा बचपन यहीं बीता है और तब से ही मैं तथा अमरलाल गहरे मित्र थे । हमनें आठवीं तक की पढ़ाई एक साथ की ।

मेरे एक ताऊजी झारसुगुड़ा कालरी में नौकरी करते थे । उनकी सिफारिश पर मेरे पिताजी को कालरी में नौकरी मिल गयी थी। 

तब भी नाना-नानी का स्वर्गवास होने तक मैं माँ के साथ यहीं रहा । उसके बाद पिताजी हमें झारसुगुडा ले गये । आगे की पढ़ाई मैने वहीं किया और कालांतर में कालरी में काम करने लगा । यहाँ की जमीन बंटाई पर दे दिया ।

उन्हीं दिनों तुम्हारे पिता अमरलाल की नौकरी लगी और वह जांजगीर में रहने लगा। इस तरह हम दोनों सखा बिछुड़ गये । हमें एक दूसरे का हालचाल चिठ्ठियों के द्वारा मिलता था । मेरा चैनपुर माकडी आना साल में एकाध बार ही होता था । कभी अमर से मुलाकात होती और कभी नहीं होती ।

सन 1964 में ऐसा संयोग बना कि हम दोनों मित्र दीवाली मनाने चैनपुर में थे । मेरा अधिकतर समय यहीं इसी कमरे में बीतता था ।

कुछ समय पहले गाँव के पुरोहित पं.गंगाधर शर्मा जी के ऊपर लकवा का प्रहार हुआ था । त्वरित उपचार से वे स्वस्थ तो हो गये किंतु चाल(चलने) और उच्चारण (बोलने) में कुछ कसर रह गयी थी । 

हम उन्हें पुरोहित चाचा कहते थे, इसलिए हमनें पहले उनका हालचाल और आशीर्वाद लिया । लकवा (पैरालिसिस) किसी भी तंदरुस्त आदमी को बिस्तर पकड़ा देने का सामर्थ्य रखता है । पुरोहित चाचा की हालत देखकर हमें बहुत अफसोस हुआ था । 
एक दिन दोपहर के समय अमर दौड़ा-दौड़ा मेरे घर आया और बोला -जल्दी चल ! अगर तीतर-बटेर की पार्टी उड़ानी है तो ?

कहाँ – मैंने पूछा था ?

पंडित चाचा के घर !

मैं तुरंत साथ हो लिया । अमर ने मुझे रास्ते में जल्दी से सारी बातें बताई और यह भी कि आगे क्या और कैसे करना है ।

उस दिन पड़ोसी गाँव का एक बहेलिया चैनपुर आया हुआ था उसके पास दो तीतर थे । अमर ने तीतरों खरीदना चाहा तब बहेलिये ने इंकार करते हुए कहा था कि वह अभी जल्दी में है, बाद में तीतरों को बेचने की बात करेगा ।

अमर मन मसोसकर रह गया । संयोग वश कुछ देर बाद उसे वह बहेलिया गंगाधर चाचा के घर से निकलता हुआ दिखाई दिया । तब उसके हाथ मे बाँस का पिंजरा नहीं था,जिसमें वह पंछी रखता था ।

अमर को यह समझते देर नहीं लगी कि तीतरों के असल खरीददार गंगाधर चाचा ही हैं । किसी ने उन्हें तीतर का शोरबा पीने का सलाह दिया होगा । ऐसी मान्यता है कि कबूतर, तीतर,जंगली मुर्गी आदि पंछियों से तैयार शोरबा पीने से लकवाग्रस्त आदमी बिल्कुल ठीक हो जाता है । 

हम दोनों मित्र पक्के माँसाहारी नहीं थे, लेकिन हमें इससे परहेज भी नहीं था, ऊपर से तीतर जैसे पंछी का रसास्वादन का मौका, जो कि यदा कदा ही मिलने वाला मौका होता था, और जिसे छोड़ना हमारी बहुत बड़ी बेवकूफी होती ।

खूब सलाह करके हम दोनों गंगाधर चाचा के यहां जा पहुंचे । चाचा का बिस्तर मकान के बाहरी कमरे में लगा था जिसमें जाने के लिए रास्ता प्रवेश द्वार से होकर गुजरने वाले गलियारे से जाता था ।

हमनें उन्हें प्रणाम किया और वहीं जमकर बैठ गये । हमने कमरे का निरीक्षण किया तब पाया कि दूर वाले कोने में एक बड़ा सा बाँस का टोकरा उल्टा रखा हुआ था । उसके अतिरिक्त वहाँ और कोई असामान्य बात हमें नहीं दिखाई दिखाई दी । इसका मतलब था कि तीतर टोकरी के नीचे ही थे हम लोग बिल्कुल सही समय पर पहुँचे थे ।

हमने अनुभव किया कि चाचा जी का ध्यान बातचीत पर कम था और टोकरी की ओर अधिक था । अभी हमें वहाँ पाँच मिनट भी नहीं हुआ था कि एकाएक कमरे में पंछियों की बोली कें-कें-कें-कें से गूँज उठा । यह आवाज लगातार और कुछ सीटी की ध्वनि मिश्रित थी । 
मैंने पूछा –चाचाजी ! यह कौन बोला !

कोई चिडिय़ा बोल रही है—अमर ने कहा !

मैं शर्त लगाने को तैयार हूँ कि यह तीतर के बोलने की आवाज है और वे दो होने चाहिए – मैंने कहा ।

अब तो पंडित चाचा पसीना-पसीना हो गये थे ।

इतना कहकर ठाकुर साहब दम लेने के लिए ठहरे फिर बोले – इसके बाद हमने चाचाजी के मना करने के बावजूद टोकरा हटा दिया । उसके नीचे बाँस के पिंजरे में बंद दो तीतर कें-कें कर रहे थे । 

उस वक्त का गंगाधर चाचा के चेहरे का हाल मुझे अब तक याद है,जिसमें क्रोध, शर्मिंदगी, और बेबसी का मिला जुला भाव था ।

अमर बोला - राम-राम,-राम-राम !! चाचाजी ! घोर अनर्थ ! हमें आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी । आप वेद-शास्त्र के जानकार विद्वान हैं और पंछी का मास खाते हैं, यह तो बहुत बुरी बात है । यह घोर निंदनीय कृत्य है ।

हाँ चाचा जी !- मैंने कहा – आप लोगों को जीवहत्या के विरुद्ध प्रवचन देते हैं और छुप-छुप कर तीतर- बटेर खाते हैं ! राम राम !! कितना अंधेर है । 

अमर उनके कान में फुसफुसाया – चाचा जी ! खैर मनाईये कि यह हमने देखा है, यदि कोई दूसरा देख लेता तो गजब हो जाता । आपके यजमानों को इस बात का पता चलेगा तब वे आपसे कथा पूजा थोड़े ही करायेंगे । यजमान भले ही, कुछ भी करे और कुछ भी खाता-पीता रहे, लेकिन उसे अपना पुरोहित सात्विक खान-पान वाला ही चाहिए होता है !

और चाचाजी !—मैंनें कहा -आपने अपना पूरा जीवन दाल-रोटी में गुजारा है । अब मास खाकर क्यों अपनी बुढ़ौती खराब कर रहे हैं ।

अरे ! तुम दोनो खुद बोले जाओगे कि मेरी भी कुछ सुनोगे—गंगाधर चाचा ने झल्ला कर कहा – जो तुम दोनों बक रहे हो ! वह सब मैं भी जानता हूँ ! पहले इतना जान लो कि ये तीतर मेरे खाने के लिए नहीं है ! 

तब ? 

ये मुझे दक्षिणा में मिले हैं !

तीतर दक्षिणा में ? और वह भी दो-दो ? वाह चाचाजी !

हाँ ! वह बहेलिया जिसे शायद तुम लोगों ने देखा है वह मेरे पास तीतर बेचने नहीं बल्कि शगुन दिखाने आया था । उसकी एक गाय हफ्ता भर पहले से गुम है । मैंने शगुन देखकर बताया है कि आज उसे अपनी गाय मिल जायेगी । उसने मुझे सवा रुपए दक्षिणा देना चाहा किंतु उसके पास मात्र चौदह आना था । वह चौदह आना तुरंत देकर बाकी का छ:आना बाद में देना चाहता था । 
मैने उसे नियम बताया कि दक्षिणा में संकल्पित रकम इकठ्ठी दी जाती है,थोड़ा-थोड़ा करके नहीं, तब पुण्य की प्राप्ति होती है - और उसके पैसे उसे लौटा दिया कि- तुम्हारे पास जब भी सवा रुपए हों तब दे देना ! मुझे कोई जल्दी नहीं है । 

बहेलिये को मेरे बताए स्थान पर अपनी गाय ढूंढने जाना था अतः वह चौदह आनों के साथ तीतर यहीं छोड़ गया कि वह छ:आने लेकर आयेगा तब दोनों तीतरों को ले जायेगा.।

हमने कहा – चाचाजी ! बहेलिये की दक्षिणा के छ:आने आप हमसे ले लीजिए और ये तीतर हमें दे दीजिए ! 

उन्होंने खूब मना किया लेकिन हम भी अड़ गये । हमनें उनसे कहा कि आप मना करेंगे तो हम लोगों को बता देंगे कि गंगाधर चाचा तीतर का मास खाते हैं, हमने खुद देखा है । 

इस बात से चाचा थोड़े भयभीत हो गये । और छ:आना के बदले तीतर देने को राजी हो गये ।

हमने कुछ देर बाद उन्हें छ:आने देने को कहा और दोनों तीतरों को लेकर चलते बने ! 

काका जी ! और आप लोगों ने पंडित दादा जी को छ:आना नहीं दिया – है ना –निर्मल ने पूछा – 

हाँ ! बेटा ! क्योंकि एक ब्राह्मण को मास या पंछी बेचना शोभा नहीं देता । इससे घोर पाप लगता है और हम अपनी समझ में उन्हें इस भयंकर पाप से बचाना चाहते थे, इसलिए हमने गंगाधर चाचा को छ: आना नहीं लौटाये । 

ऐसा नहीं कि उन्होंने वे अपने छ:आने हमसे नहीं माँगे । जब भी मुलाकात होती थी वे दबे-छुपे तौर पर उसका तकाजा करते और समझाते कि पुरोहित की दक्षिणा दूसरों को कभी भी हजम नहीं होती ।

तब हम लोगों में बचपना थी अतः उनके तकाजे पर हम खूब हँसते और मजा लेते थे । इस घटना के चार-पाँच साल बाद गंगाधर चाचा का स्वर्ग वास हो गया और हम दोनों भी छ:आने वाली बात धीरे-धीरे भूल गये ।

काका जी ! हम किस तरह पंडित दादा जी का कर्ज चुकायें, जिससे पिताजी की आत्मा को शांति मिले ?—निर्मल ने पूछा !

तुम्हें गंगाधर चाचा के उत्तराधिकारी को अपने पिता की ओर से ऋणमुक्ति हेतु छ:आना संकल्प पूर्वक देना होगा । इससे मृतात्माओं को ऋण से मुक्ति मिलेगी ! 
बहुत अच्छा चाचाजी – मैं कल ही वार्षिक श्राद्ध के पूर्व छ:आने का कर्ज अदा करुंगा - निर्मल बोला । 
अब तुम जाओ व्यवस्था देखो – मैं कुछ देर आराम करना चाहता हूँ – ठाकुर काका ने तख्त पर पसरते हुए कहा ।

निर्मल ने उन्हें प्रणाम किया और हलवाइयों का काम देखने चला गया, जो गुलाब जामुन तथा बालूशाही वगैरह बना रहे थे ।


अरे आप कहाँ चले गये थे – कालिंदी ने निर्मल से पूछा जो हलवाई से यह पूछने तभी वहाँ आई कि दालमोठ अभी बनेगी कि रात में ? वह निर्मल को वहाँ देख हैरान हो गयी !

निर्मल ने जल्दी से उसे ठाकुर काका के बारे में बताया और सपना आने का कारण भी ।

काका कब आये –

यही कोई घंटा भर पहले !

ऐसा कैसे हो सकता है ? – कालिंदी बोली—कल ही झारसुगुड़ा से छोटे भैय्या का फोन आया था कि पिताजी की हालत बहुत नाजुक है, उन्होंने खाना पीना भी छोड़ दिया है !

लेकिन काका तो यहाँ पधारे हुए हैं वह भी एकदम भले-चंगे । चलो खुद ही देख लो ! निर्मल कालिंदी को लिए हुए अपने पिता के कमरे में आया । 

कमरा खाली था । थोड़ी देर पहले ठाकुर काका यहीं थे । वे कहाँ चले गये ।

वे ठाकुर साहब के आने और अचानक गायब होने के बारे में बात ही कर रहे थे कि झारसुगुड़ा से ठाकुर साहब के छोटे पुत्र शत्रुदलन सिंह का फोन आया – निर्मल उससे ठाकुर काका का खैरियत पूछता उससे पहले ही उसने कहा -भैया ! अभी कुछ देर पहले ही पिताजी हमें छोड़ गये सदा के लिए ! 


निर्मल अवाक रह गया । उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि यदि ठाकुर काका मृत्यु शैय्या पर अपनी अंतिम बची-खुची सांसें ले रहे थे तब यहाँ उसे छ:आने की कहानी कौन बता रहा था ? 

अपने खास मित्र के अंतिम संस्कार में उपस्थित न होने के दुख ने उन्हें बेचैन कर रखा था, या छ: आने का ऋण चुकाने की तीव्र इच्छा थी, या अपने प्रिय कमरे में फिर से सुकून के दो पल बिताने की इच्छा थी या तीनों ही वो वजहें थी जो मृत्यु लोक छोड़ने से पहले उन्हें चैनपुर माकड़ी लेकर आई थी । 

निर्मल ने पिता का वार्षिक श्राद्ध से पहले पं.विद्याधर से निवेदन किया कि वह अपने स्वर्गीय पिता तथा ठाकुर अरिमर्दन सिंह का ऋण चुकाना चाहता है और पं. विद्याधर छ:आना की राशि अपने दादा की ओर से स्वीकार करें तथा मेरे पिता को कर्ज से मुक्त करें । 
पूरा मामला जानकर विद्याधर इसके लिए सहर्ष तैयार हो गये । निर्मल ने सन उन्नीस सौ पैंसठ में प्रचलित सिक्कों का प्रबंध पहले ही कर लिया था ।

निर्मल ने अपने पिता की ओर से ऋण चुकाने का और पं. विद्याधर ने अपने स्वर्गीय दादा के वारिस के तौर पर उस राशि को स्वीकार करने तथा मिश्र जी को ऋणमुक्त करने की घोषणा की

इसके बाद निर्मल को छ:आना संबंधी स्वप्न फिर नहीं आया ।